आईसीएआर-सिफ़री ने "गंगा नदी में हिल्सा मत्स्य पालन और संरक्षण पर हितधारक परामर्श सह सलाहकार कार्यशाला" का आयोजन किया
बैरकपुर , 27 सितंबर, 2023
एनएमसीजी परियोजना के तहत 27 सितंबर 2023 को आईसीएआर-सिफ़री, बैरकपुर में "गंगा नदी में हिलसा मत्स्य पालन और संरक्षण पर हितधारक परामर्श सह सलाहकार कार्यशाला" आयोजित की गई थी। कार्यशाला की शुरुआत एनएमसीजी परियोजना के सह- अन्वेषक (को –पीआई) डॉ. ए.के. साहू के स्वागत भाषण के साथ हुई। उन्होनें कार्यशाला के उद्देश्यों के बारे में जानकारी दी। सिफ़री के निदेशक और एनएमसीजी परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. बसंत कुमार दास ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में गंगा नदी में हिल्सा और डॉल्फिन संरक्षण के महत्व और 2018 से सिफ़री द्वारा किए गए वैज्ञानिक हस्तक्षेपों पर प्रकाश डाला। डॉ. संदीप कुमार बेहरा, सलाहकार, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी), श्री राजदीप मुखर्जी, नीति विश्लेषक, बीओबीपी-आईजीओ (बंगाल की खाड़ी) कार्यक्रम, श्री जी. सी. दास, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई), डॉ. डी.के. डे, सिफ़री के सेवानिवृत्त प्रधान वैज्ञानिक, डॉ. यू. भौमिक, सिफ़री के सेवानिवृत्त प्रधान वैज्ञानिक और आरईएफ प्रभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष, डॉ. सुब्रत दासगुप्ता, सिफ़री के सेवानिवृत्त प्रधान वैज्ञानिक, डॉ. आशिम कुमार नाथ, एसबीकेयू विश्वविद्यालय के प्राणीशास्त्र विभाग के प्रोफेसर, प्रोफेसर सुधीर कुमार दास, डब्ल्यूबीयूएएफएस, और डॉ. गायत्री त्रिपाठी, प्रधान वैज्ञानिक, आईसीएआर-सीआईएफई विशेषज्ञ सदस्यों के रूप में इस अवसर पर उपस्थित थे। डॉ. संदीप बेहरा ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में 2018 से सिफ़री द्वारा किए गए हिल्सा मत्स्य पालन सुधार कार्यक्रम के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने फरक्का बैराज में मछली के संचालन की स्थिति को उन्नत करने के लिए मछली को लॉक गेट से अपस्ट्रीम की दिशा में गुजरने में अतिरिक्त सहायता प्रदान किए जाने की बात कहीं। इससे गंगा नदी में हिल्सा प्रवास बढ़ेगा।

सिफ़री के निदेशक डॉ. बि.के. दास ने पिछले 3 वर्षों से एनएमसीजी हिल्सा परियोजना (घटक II) के तहत किए गए कार्यों की एक संक्षिप्त प्रस्तुति के साथ कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत की। प्रेजेंटेशन में उन्होंने परियोजना के उद्देश्यों, परियोजना के तहत महत्वपूर्ण गतिविधियों और उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। डॉ. दास ने बताया कि गंगा नदी के मध्य खंड में हिल्सा स्टॉक को बढ़ाने के उद्देश्य से फरक्का बैराज के ऊपरी प्रवाह में 90,000 से अधिक हिल्सा को छोड़ा गया हैं। उन्होंने हिल्सा पालन प्रक्रिया, टैगिंग विधियों और अपस्ट्रीम में हिल्सा की पुनर्प्राप्ति के बारे में जानकारी दी। हिल्सा के प्रजनन को बढ़ाने के लिए अंडे और स्पॉन को भी नदी में प्रवाहित किया गया और हिल्सा की आबादी पर रैन्चिंग के प्रभाव को भी प्रस्तुत किया गया। डॉ. बि.के. दास ने हिल्सा के कैप्टिव प्रजनन और पालन के लिए परियोजना के तहत किए गए प्रयोगों को भी प्रस्तुत किया। गंगा नदी में हिल्सा की बहाली और संरक्षण और उनके पालन-पोषण से संबंधित मुद्दों और चुनौतियों पर भी चर्चा की गई।

पैनल चर्चा के दौरान, विशेषज्ञ सदस्यों ने आईसीएआर-सिफ़री द्वारा विशेष रूप से रैन्चिंग कार्यक्रम के कारण प्रयागराज से फरक्का के बीच गंगा नदी के ऊपरी हिस्से में हिल्सा की पुन: उपस्थिति की सराहना की। उन्होंने हिल्सा प्रजनन स्थलों की पहचान करने और उन्हें विनाशकारी मछली पकड़ने से बचाने पर विस्तृत काम करने पर जोर दिया। हिलसा को पिंजरों और अन्य प्रणालियों के तहत बंध जगहों में पालन करने के तकनीकों पर अधिक शोध प्रयास करने की आवश्यकता हैं। उन्होंने गंगा नदी में हिल्सा के स्थायी प्रबंधन से संबंधित रणनीतियों और हिल्सा मत्स्य पालन प्रबंधन के लिए राज्य सरकारों और अनुसंधान संगठन के बीच सामंजस्य स्थापित करने पर भी चर्चा की। इसके अलावा, पीक सीज़न के दौरान छोटे जालीदार जालों का उपयोग न करना, अवैध मछली पकड़ने पर रोक और ब्रूडर संग्रह जैसी चुनौतियों को अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दों के रूप में बताया गया। गोधाखाली, डायमंड हार्बर के मछली किसानों/मछुआरों ने भी विशेषज्ञ सदस्यों के साथ बातचीत की और हिल्सा के कम उपलब्धता के बारे में चिंताएं व्यक्त की और भविष्य में सिफ़री से विस्तारित सहयोग के लिए सहमति व्यक्त की। अंत में, एनएमसीजी के सह-अन्वेषक डॉ. डी.के.मीना द्वारा प्रस्तावित धन्यवाद प्रस्ताव के साथ कार्यशाला औपचारिक रूप से समाप्त हो गई। कार्यक्रम का संचालन डॉ. ए. के. साहू, डॉ. डी.के.मीना, श्री संथाना कुमार और श्री मितेश रामटेके द्वारा किया गया। सिफ़री के निदेशक डॉ. बसंत कुमार दास की समग्र देखरेख में एनएमसीजी घटक II के अनुसंधान विद्वानों के सहयोग से यह कार्यशाला सुचारु रूप से सम्पन्न हुआ।





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